Monday, October 27, 2008
जीवन संगीत
कितनी मधुर है हवाओं की ठंढक, सूर्य की रौशनी,मिटटी की खुशबू,फूलों की सुगंध. पक्षियों के कलरव, भौरों की गुनगुनाहट सब तो हमारे जीवन में संगीत ही पैदा कर रहे होते है. जब आप किसी बडे पेड को देखे जो अपने नीचे खडे यात्री को छाया प्रदाने करते समय बिल्कूल गुरू,पिता व परमेश्वर की भांति प्रतीत होते है. हम अपने आस पास के जीवन में कितनी सुकून व शांति को छोड रहे है, इसका कोई हिसाब नही है. प्राक़तिक संगीत को छोडकर कानफोडों संगीत के पीछे भागते भागते हमारे युवा मन को न जाने क्यों एक बार फिर जीवन अपनी ओर आकर्षित करता है. क्या हम उसके बिना रह सकते है, हमारा संपूर्ण अ स्तित्व ही कही उसपर नि र्भर नही है. हम आंखे बंद करते है तो हमें सबसे पहले ईश्वर का ध्यान आता है, और श्रद्वा से सिर उनके चरणों में झुक जाता है, अब चाहे इसे आप अल्लाह या गॉड या राम का नाम दे सकते है, लेकिन ईश्वर हमारें जीवन में नित नई संगीत पैदा करता रहता है हम है कि उसके संकेतों की भाषा भी नही समझते. हमने अपने जीवन से मौन को विदा कर रखा है. प्यार की भाषा खोने के कागार पर पहुंच गये है. भौतिकता की चकाचौंध में हमने अपने जीवन को नर्क के समान बना लिया है. चीख चीखकर हमारे वेद,पुराण,गीता कहते है कि इस क्षणभंगूर जीवन में शाश्वस्त सत्य सिर्फ ईश्वर है. उसकी इच्छा से ही हमारे व्यक्तित्व का प्रत्येक कोना महकता है. ईश्वर हमारे लिए प्रेम की वर्षा कर रहे है,हम है कि अपनी शिकायतों का पुलिंदा लिये बैठे है. हम अपनी धरती को कैसा बनाना चाहते है प्रेम पूर्ण या घ़णा आधारित यह हम पर नि र्भर करता है. मुझे नही लगता की दुनिया को कोई भी शख्स सिर्फ धन व सुवि धा की कामना से ईश्वर के पास जाता है. दरअसल उसे पूर्ण प्रेम की उम्मीद होती है. ईश्वर द्वारा संप्रेषित संकेत,भाषाएं, उक्तियां हमारे आसपास नित दिन मार्गदर्शन करती रहती है. उन्हें ध्यान से सुने तो जीवन संगीत मय हो जाये.
Saturday, October 25, 2008
स्वयं से
यह जीवन निस्सार है तब तक जब तक वह पूर्णता को प्राप्त नहीं हो जाता, इसका मिलन उस आसीम से नहीं हो जाता जो प्रेम व घृणा से अलग है,जहा जाकर विचारो की श्रृंखला समाप्त हो जाती है,पूर्ण आनद की स्थिति होती है.
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