Wednesday, November 23, 2011
मेडिकल कचरे कितने खतरनाक पर हम हैं अनजान
हरी हरी हो वसुंधरा, हरी भरी हो हर डगर। ऐसा भला कौन नहीं चाहेगा। हम मेडिकल कचरों के बीच कितनी असुरछित जीवन जी रहे हैं इसका कोई अनुमान नहीं। सिर्फ शहर ही मेडिकल कचरों के अम्बार पर नहीं हैं बल्कि इन्हें जहा उठा कर फेका जा रहा हैं। वो ग्रामीण छेत्र भी असुरछित हैं। सिर्फ बिहार के आकड़ो को खगालना शुरु किया तो हैरत से भर गया। तीन हजार किलो से ज्यादा मेडिकल कचरे प्रति वर्ष यहाँ से निकल रहे हैं। इसमें से ६०० किलो कचरे का उचित निपटारा नहीं हो रहा। ये तो एक बात हुई, दूसरी बात जो काबिले गौर हैं वो यह कि ये तो सिर्फ मेडिकल कचरे की बात हैं, इनका सही तरीके से निपटारा व संग्रहण नहीं होने के कारण लाखो टन सामान्य कचरा भी संक्रमित हो कर मेडिकल कचरे के समान खतरनाक हो जाता हैं । मेडिकल कचरे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बकायदा निर्देश जरी कर रखा हैं लेकिन इसको लेकर शायद ही कोई सरकार या आम लोग चिंतित रहते हैं। यह बेहद अफसोस की बात हैं कि विकसित राज्यों में तो थोड़ी बहुत जागरूकता भी हैं लेकिन उनकी तुलना में शेष राज्यों में कोई विशेष पहल नहीं कि जा रही हैं । आइये हम सब मिल कर चेतना जगाये , लोग सजग हो।
Monday, December 1, 2008
हरी भरी वसुंधरा को लग चुकी है आतंकी नजर
हमारे देश की हरी भरी वसुंधरा को आतंकियों की नजर लग चुकी है। हम इतने लाचार साबित हो रहे है कि दुश्मनों के ठिकानों पर नजर तक नहीं जा रही है। सरहद के उस पार आतंकी बैठे कुचक्र रचते है,इस पार की सरकार तमाशबीन बनी होती है।कुटिनीतिक व राजनीतिक विफलता का ऐसा दुर्लभ नमूना अन्यत्र देखने को कम ही मिलता है। यह वही देश है जहां पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी शक्ति का लोहा पूरे विश्व को मनवाया था, विपक्ष्ा के नेता ने उन्हें दूर्गा के संबोधन से पुकारा था। क्या आज राष्ट्र की सुरक्षा व संरक्षा की कीमत पर ऐसी रणचंडी बनने का सौभाग्य किसी में नही है। हमारे देश की प्रथम नागरिक तथा यूपीए सरकार की निर्मात्री दोनो महिलाएं है।शायद इतिहास को इससे सुनहरा अवसर नही मिल सकता जब ठोस निर्णय लेकर देश के समक्ष एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किये जा सके। हमारे देश में राजनेताओं के प्रति गुस्से का इजहार लगातार किया जा रहा है, ये नेता है कि मानते नहीं। क्या करना चाहते है व क्या बोल बैठते है. भारतीय लोकतंत्र बडी त्रासद स्थिति से गुजर रही है. आजादी के दीवानों ने ऐसा सोचा भी नही होगा कि एक अरब की आबादी इस कदर घुटने टेककर सिर्फ तमाशबीन बनी रह सकती है. देश की उन्नति की चाह रखने वाले दीवानों को अपने देश पर गर्व था, वे सर कटाना जानते थे, देश की आन बान व शान पर खतरा होने पर दुश्मनों को मुहं तोड जबाब देना भी जानते थे। क्या हिंदू क्या मुसलमान क्या सिख व क्या इसाई हमें अपने मादरे वतन से लगाव नही तो धर्म व अपने धर्म गुरूओं के उपर क्या सम्मान व लगाव होगा। जब हमीं न होंगे तो कौन हमारे धर्म व संस्क़ति की रक्षा करेगा। हमने साथ साथ जीना सीखा है साथ मरना भी जानते है। बहुत ही खूब भारतीय अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा ने इंदिरा जी के एक प्रश्न का जबाब देते हुए अंतरिक्ष से कहा था अपना हिंदूस्तान उपर से सारे जहां से अच्छा दिखता है। इस धरती की खुबसुरती न केवल देखने में है, बल्कि की इसकी आत्मा भी उतनी ही सुंदर है। कुछ जयचंदों के होने से हम इसे कलुषित न होनें देंगे। सुरक्षा को लेकर पैसे वाले पावर वाले लोगों को कोई चिंता भले ही स्थायी न हो किंूत भारतीय आम नागरिक सहमे सहमे से नजर आ रहे है। आने वाले चुनाव में इस खामोशी का इजहार होना जरूरी है। भारतीय जनता के पास लोकतंत्रिक अधिकार के नाम पर वोट देने की प्रमुख शक्ति है। सारे मीडिया के आकलन व नौकरशाहों की कारगुजारियों के बावजूद, राजनेताओं को जो देश की अस्मिता के साथ खिलवाड करते नजर आते है,उन्हें बख्शा नही जाना चाहिये। हमें यह स्पष्ट संकेत देना होगा भारतीय राजनीति को कि इस्तीफे व गैर जिम्मेदारी भरे बयानात के आधार पर राजनेताओं को बचने का रास्ता अब नहीं दिया जा सकेगा। संकट की घडी में हमने यह स्पष्ट जाना है कि चमकने वाले चेहरों के भीतर कितना डरवाना चेहरा छिपा है. ये किस कदर सिर्फ व सिर्फ स्व हित के प्रति सोचते व विचार करते रहते है. वेशर्मी की हद तो यह है कि ये शहीदों को भी नही बख्शतें है. वतन पर मिटने वालों के साथ उनके परिवारों के साथ इस कदर बर्ताव करते है कि उन्ा पर कुछ भी टिप्पणी किया जाना अपने आप में शर्मनाक है.
Monday, October 27, 2008
जीवन संगीत
कितनी मधुर है हवाओं की ठंढक, सूर्य की रौशनी,मिटटी की खुशबू,फूलों की सुगंध. पक्षियों के कलरव, भौरों की गुनगुनाहट सब तो हमारे जीवन में संगीत ही पैदा कर रहे होते है. जब आप किसी बडे पेड को देखे जो अपने नीचे खडे यात्री को छाया प्रदाने करते समय बिल्कूल गुरू,पिता व परमेश्वर की भांति प्रतीत होते है. हम अपने आस पास के जीवन में कितनी सुकून व शांति को छोड रहे है, इसका कोई हिसाब नही है. प्राक़तिक संगीत को छोडकर कानफोडों संगीत के पीछे भागते भागते हमारे युवा मन को न जाने क्यों एक बार फिर जीवन अपनी ओर आकर्षित करता है. क्या हम उसके बिना रह सकते है, हमारा संपूर्ण अ स्तित्व ही कही उसपर नि र्भर नही है. हम आंखे बंद करते है तो हमें सबसे पहले ईश्वर का ध्यान आता है, और श्रद्वा से सिर उनके चरणों में झुक जाता है, अब चाहे इसे आप अल्लाह या गॉड या राम का नाम दे सकते है, लेकिन ईश्वर हमारें जीवन में नित नई संगीत पैदा करता रहता है हम है कि उसके संकेतों की भाषा भी नही समझते. हमने अपने जीवन से मौन को विदा कर रखा है. प्यार की भाषा खोने के कागार पर पहुंच गये है. भौतिकता की चकाचौंध में हमने अपने जीवन को नर्क के समान बना लिया है. चीख चीखकर हमारे वेद,पुराण,गीता कहते है कि इस क्षणभंगूर जीवन में शाश्वस्त सत्य सिर्फ ईश्वर है. उसकी इच्छा से ही हमारे व्यक्तित्व का प्रत्येक कोना महकता है. ईश्वर हमारे लिए प्रेम की वर्षा कर रहे है,हम है कि अपनी शिकायतों का पुलिंदा लिये बैठे है. हम अपनी धरती को कैसा बनाना चाहते है प्रेम पूर्ण या घ़णा आधारित यह हम पर नि र्भर करता है. मुझे नही लगता की दुनिया को कोई भी शख्स सिर्फ धन व सुवि धा की कामना से ईश्वर के पास जाता है. दरअसल उसे पूर्ण प्रेम की उम्मीद होती है. ईश्वर द्वारा संप्रेषित संकेत,भाषाएं, उक्तियां हमारे आसपास नित दिन मार्गदर्शन करती रहती है. उन्हें ध्यान से सुने तो जीवन संगीत मय हो जाये.
Saturday, October 25, 2008
स्वयं से
यह जीवन निस्सार है तब तक जब तक वह पूर्णता को प्राप्त नहीं हो जाता, इसका मिलन उस आसीम से नहीं हो जाता जो प्रेम व घृणा से अलग है,जहा जाकर विचारो की श्रृंखला समाप्त हो जाती है,पूर्ण आनद की स्थिति होती है.
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